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मातृभूमि का ऋण सुभाष चंद्र बोस के द्वारा

Written by prachur

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस सिंगापुर में जापानियों द्वारा पकड़े गये भारतीय सैनिकों के बीच पहुँचे। उन्होंने उनसे कहा, आप लोगों को हमारी आजाद हिन्द सेना का सैनिक बनकर भारत को स्वाधीन कराने के अभियान में भाग लेना चाहिये।’

एक सैनिक अधिकारी ने उत्तर दिया, ‘नेताजी! हमने सेना में भर्ती होते समय इंग्लैण्ड के राजा के प्रति वफादारी की शपथ ली थी। दूसरे, हम भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों का नमक-अन्न खाया है, हम उनके साथ विश्वाकसघात कैसे कर सकते हैं? नेताजी ने उन्हें समझाते हुए कहा, ‘तुम कहते हो हमने अंग्रेजों का अन्न खाया है, यह बात सर्वथा गलत है। वह अन्न भारतमाँ की पावन धरती से पैदा हुआ। भारतीयों के खून-पसीने की कमाई से प्राप्त धन से तुम्हें वेतन मिलता रहा है। अंग्रेज तो लुटेंरों के समान हैं जिन्होंने हमारी मातृभूमि को छल-बल से गुलाम बनाया। अब तुम लोगों को भगवान् ने अपनी मातृभूमि का कर्ज उतारने का मौका दिया है। इस मौके को गंवओंगे तो पछताओगे।’
नेताजी सुभाष के इन शब्दों को सुनते ही हजारों भारतीय सैनिक ‘भारतमाता की जय’ का उद्घोष कर आजाद हिन्द सेना में शामिल हो गये। 

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