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आदित्य राज: भारतीय पत्रकारिता का पतन

Written by prachur
भारतीय लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया में तब हाहाकार मच गया जब ‘Reporters Without Borders’ नाम की एक संस्था ने  प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक जारी किया जिसमें भारत पाकिस्तान से तीन पायदान ऊपर 136वें स्थान पर था। कुछ बुद्धिजीवीयों ने इसे भारत में बढ़ रही असहिष्णुता और सत्तावाद का सूचक करार दिया, पर सवाल यह है कि यह सूचकांक भारतीय परिपेक्ष्य में इतना प्रासांगिक कब से हो गया।  साल 2013 में भी कांग्रेस सरकार के वक्त भारत 131वे स्थान पर ही था, तब तो किसी ने इस पर इतनी गंम्भीर चिंता जाहिर नही की थी। बहरहाल इसी वर्ष जनवरी में ‘वर्ल्ड इकनोमिक फोरम’ नाम की एक संस्था ने भी एक सर्वे जारी किया, जिसमें भारतीय मीडिया को ऑस्ट्रेलिया के बाद सबसे अविश्वसनीय संस्थान का दर्जा दिया गया। शायद तब वे बुद्धिजीवी किसी अन्य मुद्दे पर भारतीय समाज को असहिष्णु घोषित करने की चेष्ठा करने में व्यस्त रहे होंगे। यह सर्वे अपने आप में वर्तमान की पत्रकारिता की अप्रामाणिकता का एक साक्ष्य है।
 मीडिया का काम है किसी खबर को उसके मूल रूप में पाठक या दर्शक तक पहुचाना, लेकिन आज की मीडिया यह खुद ही यह निर्धारित करना चाहती है की कौन सी खबर किस रूप में जनता तक पहुँचनी चाहिए। खबर की अस्मिता की जगह किसी व्यक्तिविशेष की विचारधारा को ध्यान में रखकर संपादन किया जा रहा है। बाहुबलियों की जगह आज-कल के टी०वी० एंकर्स ने ले ली है। हर शाम अलग अलग न्यूज़ चैनल्स पर आपको स्वतः खुद को जनता की आवाज घोषित कर चुके न्यूज़ एंकर्स मिलेंगे, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार बाहुबली खुद को अपने इलाके का आका घोषित कर देते हैं। फ़र्क बस इतना ही है यहाँ आपको अपना बाहुबली चुनने की सहूलियत है, ये आपका आर्थिक शोषण तो नही करेंगे लेकिन आपका सामाजिक दोहन जरूर कर रहे हैं। यही हैं आज के ‘यंग एंग्री मैन’। यह देख कर ख़ुशी होती है कि अखाड़े में जो कुश्ती विलुप्त हो रही है, उसे इन्होंने अपने बहस की अस्मिता में समाहित कर जीवित रखा है। हर शाम कुश्ती होती है, अपने अपने ड्राइंग रूम में लगे टी०वी० पर लोग तमाशा देखने पहुँचते हैं और सभी एंकर्स अपनी अपनी फ्रैंचाइज़ी(राजनितिक विचारधारा) के लिए लड़ने लग जाते हैं। धमकियाँ भी दी जाती हैं, ‘जनता इसका जवाब आपको अगले चुनाव में देगी’। अगर जातीय वोट बैंक ख़त्म होकर चैनल्स के वोट बैंक बनने लगे, तो फिर उसे ख़त्म करने में फिर से सौ साल लगेंगे। भारतीय न्याय व्यवस्था कितनी भी धीमी हो, लेकिन हमारी मीडिया टी०र०पी० बटोरने वाले दिन भर के हर केस का मीडिया ट्रायल और फैसला न्यूज़ रूम में उसी दिन कर देती है।
आज-कल की न्यूज़ स्टोरीज़ में भी इतना ड्रामा है की टी०वी० सीरियल देखने वाली महिलाओं का भी रुझान इनमे बढ़ने लगा है। हर कूटनीतिक एवं सामरिक मसला देशों की मिसाइलों की संख्या एवं क्रिकेट स्कोर तक सिमित होकर रह गया है। हर धार्मिक मुद्दा हिन्दू बनाम मुस्लमान बन के रह गया है। “सेकुलरिज्म” के चश्मे से हर धार्मिक व्यक्ति इन्हें सांप्रदायिक दिखता है। सामाजिक कायदों का पालन करना पड़े तो इन्हे   अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता याद आने लगती है।
भारतीय पत्रकारिता अपने पतन की ओर तीव्र गति से अग्रसर है। पत्रकारों को आत्म मंथन करने की आवश्यकता है। परन्तु पत्रकारों को सलाह देने पर तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग  “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ” की दुहाई देने लगता है।
 इस लेख के लेखक आदित्य राज जी है।

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