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विनायक दामोदर सावरकर

क्रान्तिकारियों के मुकुटमणि वीर विनायक दामोदर सावरकर को लंदन में रहकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह का षड्यंत्र रचने के आरोप में गिरफ्तार कर भारत लाया गया। 31 जनवरी 1911 को उन्हें कालापानी (अंडमान) में आजीवन कारावास भुगतने की सजा सुनाई गयी। कालापानी भेजने से पूर्व उन्हें महाराष्ट्र की डोंगरी की उस जेल में भेजा गया जिसमें उनके प्रेरणास्त्रोत लोकमान्य तिलक को रखा गया था। सावरकरजी का कुछ वर्ष पूर्व ही विवाह हआ था। जब वे कानून की शिक्षा प्राप्त करने इंग्लैण्ड गये थे तब उनकी युवा पत्नी ने कल्पना की थी कि वे विदेश से वकील होकर भारत लौटेंगे किन्तु वे बन्दी बनकर भारत लाये गये तथा उन्हें जीवनभर कालापानी की जेल में तिल-तिलकर मरने की सजा सुनाई गयी तो पत्नी पर जैसे विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा।
श्रीमती यमुनाबाई कालापानी भेजे जाने से पूर्व पति से मिलने डोंगरी जेल पहुँची। उन्हों जेल में सींखचों के पीछे हथकड़ियों से जकड़ा देखकर उनकी आँखें सजल हो उठीं। सावरकर ने उन्हें धीरज बँधाते हुए कहा, ‘बेटे-बेटियों की संख्या बढ़ाना तथा आरामदायक घर बनाना ही यदि संसार कहलाता है तो ऐसा संसार तो चिड़िया तथा कौवे भी बसा लेते हैं किन्तु यदि जीवन में सच्चा अर्थ कर्त्तव्यपालन है तो हमारा परिवार भारतमाता की स्वाधीनता के ईश्वतरीय कार्य के प्रति समर्पित होकर धन्य हो गया।’
उन्होंने कारागार की सलाख से हाथ बाहर निकाला तथा अपनी पत्नी का हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘अनेक लोग प्लेग का शिकार होकर मर जाते हैं। विवाह मण्डप तक से काल पति-पत्नी को दबोचकर ले जाता है। तुम्हारे जेठ, देवर और पति तीनों मातृभूमि की आजादी के यज्ञ में आहुतियाँ दे रहे हैं। इस पर गर्व करो तथा विश्वास रखो कि मैं एक दिन फिर से तुम्हारे पास लौटकर आऊँगा।’
ये शब्द सुनते ही उनकी पत्नी की तमाम निराशा आशा में बदल गयी। उसने अपना जीवन गर्व से बिताने का संकल्प ले लिया।

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